एक ओर जहाँ देश की विकास दर उम्मीदों से कहीं आगे निकल गई है, वहीं दूसरी ओर प्रमुख शेयर सूचकांक लगातार दबाव में बने हुए हैं। इस विरोधाभास के पीछे छिपे कारणों और आने वाले समय की तस्वीर को इस विस्तृत विश्लेषण में समझने का प्रयास किया गया है।
आर्थिक दुनिया में इन दिनों एक बेहद दिलचस्प पहेली चर्चा का विषय बनी हुई है। एक तरफ़ देश की अर्थव्यवस्था तमाम अनुमानों को पीछे छोड़ते हुए शानदार गति से आगे बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ़ शेयर बाज़ार के प्रमुख सूचकांक उस उत्साह को दिखाने में पूरी तरह नाकाम नज़र आ रहे हैं।
अर्थव्यवस्था की शानदार रफ़्तार
ताज़ा आँकड़ों की मानें तो अप्रैल से जून की तिमाही में देश की सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की वृद्धि दर सात दशमलव आठ प्रतिशत रही, जो अपने आप में एक बेहद प्रभावशाली आँकड़ा है। सबसे ख़ास बात यह रही कि इसने केंद्रीय बैंक के सात प्रतिशत के अनुमान और बाज़ार की आम राय दोनों को ही पीछे छोड़ दिया।
यह तेज़ी सिर्फ़ एक आँकड़े तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसकी बुनियाद भी काफ़ी मज़बूत नज़र आई। निजी निवेश में लगभग बारह प्रतिशत की उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई, वहीं उपभोग में भी सात प्रतिशत से अधिक का इज़ाफ़ा हुआ, जो घरेलू माँग के मज़बूत बने रहने का स्पष्ट संकेत देता है।
बाज़ार का सुस्त प्रदर्शन

अब सिक्के का दूसरा पहलू देखें तो तस्वीर काफ़ी अलग नज़र आती है। देश का प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स सितंबर के आख़िर में बहत्तर हज़ार के आसपास कारोबार करता दिखा, लेकिन पिछले एक महीने में इसमें लगभग छह प्रतिशत और साल भर के मुक़ाबले क़रीब दस प्रतिशत की गिरावट देखने को मिली है।
दूसरा बड़ा सूचकांक निफ्टी भी इस साल की शुरुआत से अब तक लगभग आठ प्रतिशत नीचे आ चुका है। हैरानी की बात यह है कि दुनिया के बड़े शेयर बाज़ारों में यह इस वर्ष के सबसे कमज़ोर प्रदर्शन करने वालों में से एक रहा है, जबकि अर्थव्यवस्था लगातार चमक बिखेर रही थी।
आख़िर यह विरोधाभास क्यों
अब सबसे अहम सवाल यह उठता है कि जब अर्थव्यवस्था इतनी दमदार है, तो बाज़ार आख़िर पीछे क्यों है। इसके पीछे कई आपस में जुड़े हुए कारण बताए जा रहे हैं, जिनमें कच्चे तेल की ऊँची क़ीमतें, वैश्विक बॉन्ड बाज़ार में बढ़ती ब्याज दरें और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनी अनिश्चितता प्रमुख रूप से शामिल हैं।
इसके अलावा एक बड़ा कारण शेयरों का पहले से ही काफ़ी महँगा होना भी माना जा रहा है। जब किसी बाज़ार में मूल्यांकन पहले से ही ऊँचे स्तर पर पहुँच चुका हो, तो अच्छी आर्थिक ख़बरों के बावजूद उसमें आगे और तेज़ी आने की गुंजाइश कई बार सीमित रह जाती है, जिससे निवेशक सतर्क हो जाते हैं।
विदेशी निवेशकों का बदलता रुख़
इस पूरी कहानी में विदेशी निवेशकों की भूमिका भी बेहद उतार-चढ़ाव भरी रही है और इसने बाज़ार की चाल को गहराई से प्रभावित किया है। अगस्त के महीने में विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाज़ार में लगभग दो साल का सबसे बड़ा मासिक निवेश किया था, जिससे बाज़ार में उम्मीद की एक नई लहर जगी थी।
लेकिन इसके ठीक बाद सितंबर आते-आते उनका रवैया पूरी तरह बदल गया और वे बड़े पैमाने पर बिकवाली करने लगे। महज़ एक ही महीने में उनकी शुद्ध बिक्री दो अरब डॉलर के पार पहुँच गई, और इसी लगातार बिकवाली ने सूचकांकों पर सबसे भारी दबाव बनाने का काम किया है।
छोटी कंपनियों की चमक बरक़रार
यह मान लेना ग़लत होगा कि पूरा बाज़ार ही मायूसी में डूबा हुआ है, क्योंकि इसकी गहराई में कुछ चमकीले धब्बे भी मौजूद हैं। दिलचस्प बात यह है कि जहाँ बड़े सूचकांक लड़खड़ा रहे थे, वहीं छोटी कंपनियों के शेयरों ने अगस्त में नई ऊँचाइयों को छूकर सबको चौंका दिया था।
मँझोली कंपनियों के शेयरों ने भी इसी दौरान अच्छा-ख़ासा प्रदर्शन किया और निवेशकों को बेहतर रिटर्न देने में कामयाब रहे। यह इस बात का संकेत है कि घरेलू निवेशकों का भरोसा अब भी बरक़रार है और वे बड़ी कंपनियों से हटकर दूसरे अवसरों की तलाश में जुटे हुए हैं।
आगे की राह कैसी होगी
फ़िलहाल केंद्रीय बैंक ने अपनी प्रमुख नीतिगत दर को पाँच दशमलव दो पाँच प्रतिशत के स्तर पर स्थिर बनाए रखा है, जबकि महँगाई दर भी लगभग पाँच प्रतिशत के आसपास नियंत्रण में बनी हुई है। ये दोनों ही कारक अर्थव्यवस्था के लिए एक स्थिर और अनुकूल माहौल तैयार करने में मदद करते हैं।
जानकारों का मानना है कि जैसे-जैसे कंपनियों की कमाई अर्थव्यवस्था की रफ़्तार के साथ तालमेल बिठाएगी, बाज़ार और वास्तविक विकास के बीच की यह खाई धीरे-धीरे भर सकती है। लंबी अवधि के लिहाज़ से मज़बूत बुनियाद वाली अर्थव्यवस्था आख़िरकार बाज़ार के लिए भी अच्छी ख़बर ही साबित होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

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